मी-टू: एमजे. अकबर ने खबर पर चर्चा के लिए होटल में बुलाया फिर मेरे साथ रेप किया

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एम.जे अकबर जिन्हें मैं जानती हूं और वे अंग्रेजी अखबार द एशियन एज के एडिटर इन चीफ होने के साथ एक बेहतरीन और तेज तर्रार पत्रकार थे। उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल मेरे लिए गलत ढंग से किया। मेरी जिंदगी की सबसे दर्दनाक कहानी है जिसे आज दुनिया के सामने रख रही हूं जिसे मैने 23 साल पहले सहा था। हाल ही कुछ दिन पहले मैं अमरीका स्थित अपने घर पर थी। खबरों में देखा कि कुछ महिला पत्रकार एम.जे अकबर द्वारा किए गए यौन शोषण का खुलासा कर रही हैं। इसे देख मेरा सिर चकरा गया और मैने भारत में रहने वाली दो दोस्तों को फोन किया। मेरे इन दोनों दोस्तों को अच्छे से पता था कि अकबर ने मेरे साथ क्या किया था और मैने उस पीड़ा को कैसे सहा था। दोस्तों के बाद जिससे मेरी शादी होने वाली थी उनसे मुलाकात के कुछ हफ्तों बाद ये वाक्या बताया था और फूट फूट कर रोई थी।

मैं जब एशियन एज अखबार में काम कर रही थी उस वक्त मेरी उम्र महज 22 साल थी जहां महिलाओं की संख्या अधिक थी। अधिकतर लोगों ने अखबार कॉलेज खत्म होते ही जॉइन किया था। ये वे दौर था जब किसी को पत्रकारिता और खबरों की समझ नहीं थी। दिल्ली में अकबर के साथ काम करना सभी के लिए सौभाग्यशाली मौका था क्योंकि तेज तर्रार पत्रकार होने के साथ उन्हें राजनीति पर दो किताबें लिखने का भी अनुभव था। इसी का नतीजा रहा कि उन्होंने बहुत कम समय में भारत में संडे मैगजीन, द टेलीग्राफ जैसे अखबारों की सफल लॉन्चिंग की। अंतरराष्ट्रीय स्तर के अखबार द एशियन एज उनका आखिरी अखबार था जिसमें उन्होंने काम किया था।

अकबर उस वक्त 40 की उम्र में थे जो पत्रकारिता की दुनिया में आने वाले नए लोगों को तराशने का काम करते थे। वे हमारी लिखी खबरों को मॉन्ट ब्लैंक कंपनी के लाल पेन से गलतियों को मार्क करते थे। कई बार वे खबरों के प्रिंट को मोड़ कर कूड़े के ढेर में फेंक देते थे। ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब वे अपनी ऊंची आवाज में चिल्लाते नहीं थे। हम बहुत मुश्किल से ही उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाते थे।

जब वे भुनभुनाते थे तो मैं समझती थी कि वे क्या बोल रहे हैं। काश मैं वो सब लिख पाती कि कैसे वे अपशब्दों का इस्तेमाल करते थे। फिर भी मैं यही सोचती थी कि मैं एक अच्छे व्यक्ति से कुछ सीख रही हूं और सब सहती चली गई। 23 साल की उम्र में मुझे एशियन एज अखबार के संपादकीय पृष्ठ के साथ आने वाले ओप-एड पेज का संपादक बना दिया गया। इसके बाद मुझे देश के जाने माने टिप्पीणीकारों, लेखकों और देश के चुनिंदा राजनेताओं के साथ संपर्क साधकर काम करने का मौका मिला। इसमें जसवंत सिंह, अरुण शौरी, नलिनि सिंह जैसे बड़े नाम थे जो मेरे जैसे युवा पत्रकार के लिए एक बड़ी बात थी।

जब मुझे इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी

कम उम्र में कामयबी की कीमत मुझे बहुत जल्दी चुकानी पड़ी। मेरी दोस्त तुशिता को इसके बारे में अच्छे से पता है। ये बात 1994 की है। मैं उनके दफ्तर जिसका दरवाजा अक्सर बंद रहता था उसमें ओप-एड पेज दिखाने के लिए गई जिसे मैने अच्छे से तैयार किया था और हैडिंग अपने हिसाब से बेहतर लगाई थी। उन्होंने मेरी तारीफ की और मुझे चूमने के लिए मेरी तरफ बढ़ गए। मैं हैरान रह गई। मैं जल्दबाजी में ऑफिस से बाहर निकली। मेरा चेहरा लाल था, मैं पूरी तरह से असमंजस की स्थिति में थी। अपाानित महसूस करने के साथ पूरी तरह टूट चुकी थी। तुशिता को याद है कि उस दिन कैसे मेरा चेहरा लाल हो गया था क्योंकि मैने उसी के साथ इस घटना को साझा किया था।

कुछ महीने बाद फिर से मुंबई में हुई दूसरी कोशिश

अकबर ने दूसरी बार मेरे साथ घिनौनी हरकत पहली घटना के कुछ महीने बाद की। मुझे एक मैगजीन की लॉन्चिंग के लिए मुंबई बुलाया गया था। उन्होंने मुझे ताज होटल के कमरे में मैगजीन के ले-आउट के साथ बुलाया था। वहां भी उन्होंने मुझे चूमने की कोशिश की। इसके बाद मैं उनके साथ लड़ी और धक्का दे दिया। मैं वहां से भागने लगी तो उन्होंने मेरा चेहरा नोच दिया। मैं वहां से रोते हुए भाग निकली। मेरी दोस्त ने चेहरे के दाग के बारे में पूछा तो बताया कि मैं होटल के सीढिय़ों पर फिसल गई थी जिस वजह से चोट लग गई।

दिल्ली आई तो नौकरी से निकालने की धमकी

जब मैं मुंबई से दिल्ली वापस आई तो अकबर मेरे ऊपर काफी गुस्सा थे। उन्होंने मुझे धमकी दी कि दोबारा मैने उनका विरोध किया तो नौकरी से निकाल दिया जाएगा। इसके बाद भी मैने नौकरी नहीं छोड़ी। मैं सुबह आठ बजे ही दफ्तर पहुंच जाती थी। ये वो वक्त था जब दफ्तर में बहुत कम लोग आते थे। जल्दी जाने का मेरा लक्ष्य ओप-एड पेज को सुबह ग्यारह बजे से पहले तैयार कर लेना था। इसके बाद मैं रिपोर्टिंग पर जाने के लिए दफ्तर छोड़ देती थी।

जयपुर में हुई घटना ने मुझे तोडकऱ रख दिया

मुंबई की घटना के बाद एक खबर करने के लिए मुझे दिल्ली से दूर एक गांव गई थी। यहां पर एक प्रेमी जोड़े को फांसी पर लटका दिया गया था क्योंकि वे दोनों अलग-अलग जाति धर्म के थे। खबर जयपुर में जाकर पूरी हुई। अकबर ने मुझे कहा कि वे जयपुर के होटल में आएं वे खबर को लेकर कुछ चर्चा करना चाहते हैं। होटल के कमरे में मैने उनके साथ संघर्ष किया लेकिन वे शारीरिक रूप से मुझसे काफी मजबूत थे इसलिए मैं उनके सामने थक गई। उन्होंने मेरे कपड़े फाड़ दिए और मेरा रेप किया। मैने शर्म के मारे पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। इस घटना के बारे में मैने किसी को कुछ नहीं बताया क्योंकि मुझे लगता था कि कोई मेरी बात पर विश्वास नहीं करेगा। मैने अपने आप को दोषी माना और खुद से कहा कि मैं क्यों होटल के कमरे में गई थी।

इसके बाद उन्होंने मुझे काफी प्रताड़ित किया

अकबर का दुव्र्यवहार मेरे खिलाफ समय के साथ बढ़ता ही चला गया। मैने उनके साथ लडऩा छोड़ दिया। मैं पूरी तरह असहाय महसूस कर रही थी। वे लगातार मुझे कोसते रहे। कुछ महीने तक उन्होंने भावनात्मक रूप से, मौखिक रूप और यौन रूप से शोषण किया। अगर वे मुझे किसी हम उम्र पुरुष साथी के साथ बात करते हुए देखते थे तो तेज आवाज में चिल्लाकर गुस्सा करते थे जो मेरे लिए काफी डरावना था।

मैं बता नहीं सकती वे मुझपर कैसे हावी हो गए

मैं उनके इस बर्ताव पर लड़ क्यों नहीं सकी? मैं हमेशा से हर परिस्थिति में खुद से लडऩे को तैयार थी लेकिन मैं अब ये नहीं बता सकती की वे मुझपर कैसे इतना हावी हो गए जिसका विरोध मैं नहीं कर सकी। मैं उस वक्त मरणासन्न स्थिति में कैसे चली गई। क्या वे मुझसे ताकतवर थे इसलिए मेरे साथ ऐसा हुआ। क्या ये कारण था कि मुझे स्थिति से निपटने का तरीका नहीं पता था। या इसलिए उस इंसान को लेकर ऐसा सोचा ही नहीं था कि वो ऐसा हो सकता है। क्या मुझे नौकरी खोने का डर था? मैं अपने अभिभावकों को ये कैसे बताती जो मुझसे काफी दूर थे। मुझे बस यही पता था कि मुझे खुद से नफरत हो गई थी। मैं धीरे-धीरे घुट-घुट कर मर रही थी।

दफ्तर से दूर रहने के लिए बाहर जाने का मौका तलाशती थी

मैं दफ्तर से बाहर रहने के लिए रिपोर्टिंग से जुड़े कार्यक्रम की तलाश में रहती थी जिससे मैं अकबर से दूर रह सकूं। मुझे याद है जब 1994 के चुनावों को कवर करने का मौका मिला था। दिल्ली से दूर कर्नाटक में मैने रैली कवर कर खबरें लिखीं। इन दिनों मैने बड़े राजनेताओं के साक्षात्कार किए और ग्रामीणों से बात कर खबरें लिखी। ये तजुर्बा मेरे लिए बेहद खास था जब मैने राजनीतिक घटनाक्रम को कवर किया। चुनाव की कवरेज मेरे लिए खास इसलिए थी क्योंकि मैं ही वे रिपोर्टर थी जिसने उस समय हुए चुनाव के परिणाम का सटीक विश्लेषण किया था।

जब अकबर ने मुझे विदेश जाने का मौका दिया

चुनाव परिणाम आने के बाद मेरे काम से खुश होकर अकबर ने मुझे अमरीका या ब्रिटेन भेजने के लिए कहा था। मुझे दोनों देशों स काम का वीजा मिल गया। मैं इसको लेकर काफी रोमांचित थी। मैं आश्वस्त हो गई कि अब दिल्ली ऑफिस से बाहर निकलने के बाद मेरे साथ हो रहा शारीरिक और मानसिाक शोषण बंद हो जाएगा। हालांकि मुझे इसका भी डर था कि वे मुझे इसलिए विदेश भेज रहे हैं जिससे मेरे पास खुद का बचाव करने का कोई आधार न रहे। वे जब चाहें अनजान शहर में आएं और मेरे साथ वो करें जो वे चाहते हैं।

लंदन ऑफिस में जब अकबर ने मुझे मारा

मुझे याद है कि जब वे एक बार लंदन ऑफिस आए थे और मैं अपने एक पुरुष दोस्त के साथ थी। वहां उन्होंने मुझसे बड़े अच्छे से बात की। शाम को जब मेरा दोस्त दफ्तर से चला गया तो अकबर ने मुझे मारा और टेबल पर रखे सामान को इधर से उधर फेंकना शुरू कर दिया। इसमें कैंची, पेपरवेट और दूसरी चीजें थीं जो हाथ में आया उसे फेंक दिया। मैं दफ्तर से भाग गई और हाइड पार्क में करीब एक घंटे तक छुपी रही। अपनी दोस्त तुशिता को ये कहानी अगले दिन बताई। इसके बाद मैने अपनी मां और बहन से भी बात की लेकिन उनसे कोई बात साझा नहीं की। मैं उन्हें नहीं बताना चाहती थी कि मैं किसी परेशानी में हूं ताकि वे मुझे वापस बुलाने लगे। मैं भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुकी थी। मुझे अहसास हो गया था कि अब मुझे लंदन छोडऩा होगा। तुशिता के अलावा इस पूरी घटना की जानकारी अपनी दोस्त सूपर्णा को भी बताया और कहा कि मैं इस कष्ट से दूर भागना चाहती हूं। मेरे पास अमरीका के लिए विदेश संवाददाता का वीजा था। मेरे साथ कुछ वरिष्ठ संपादक थे जिनके साथ मैं काम करती थी। लेकिन अकबर प्रभारी थे इसलिए उन्होंने मुझे बिना देर किए मुंबई तलब कर लिया लेकिन इस बार मैं अच्छे के लिए बच गई।

जब न्यूयॉर्क में मुझे रिपोर्टिंग की नौकरी मिली

इसके बाद मुझे न्यूयॉर्क के डॉजोन्स प्रकाशन में रिपोर्टिंग असिस्टेंट की नौकरी मिल गई और वहां पर मैने काम करना शुरू किया। आज मेरे पास अमरीकी नागरिकता है। मैं एक पत्नी के साथ एक मां हूं और पत्रकारिता के लिए प्रेम आज भी बना है। मैने अपनी जिंदगी को टुकड़े-टुकड़े में पूरी मेहनत के साथ एकत्र किया है। इसी का नतीजा है कि डॉजोन्स के बाद बिजनेस वीक, यूएसए टुडे, एसोसिएटेड प्रेस से होते हुए सीएनएन के लिए काम किया। आज मैं नेशनल पब्लिक रेडियो (एनपीआर) की लीडर हूं। मुझे ये अच्छे से पता है कि नौकरी पाने और सफल होने के लिए किसी को अपमानित करने और किसी पर हमला करने की जरूरत नहीं है।

अकबर कानून और न्याय से ऊपर हैं

कई वर्षों के बाद भी अकबर से कोई बात नहीं हुई। मुझे हमेशा लगता रहा है कि अकबर कानून और न्याय से ऊपर हैं जिनपर ये दोनों लागू नहीं होते। मुझे लगता था कि उन्हें इसके लिए कभी कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी जो उन्होंने मेरे साथ किया था।

अकबर ने मी-टू के खिलाफ दी सफाई

मालूम हो कि दो हफ्ते पहले एमजे. अकबर ने मी-टू अभियान के तहत लगे आरोपों के बाद केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने इसपर सफाई देते हुए कहा था कि उनके ऊपर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं और साजिश के तहत लगाए जा रहे हैं। अकबर ने अपने ऊपर लगे आरोप के बाद एक महिला पत्रकार पर मानहानि का केस भी किया है। अकबर के इस फैसले से मैं हैरान नहीं हूं। वे मानते हैं कि वे सच अपने हिसाब से तैयार करते हैं। उन्हें लगता है कि हमारे शरीर को इस्तेमाल करने का अधिकार प्राप्त है।

मुझे पता है मेरे बोलने से कोई फायदा नहीं होगा

मुझे पता है कि मेरे बोलने से मेरा कोई फायदा नहीं होगा। लेकिन ये दिल दहलाने वाला है क्योंकि जो लोग मेरे करीब हैं उन्हें मेरे दर्द का अहसास होगा। अकबर ने ऐसी कई महिलाओं को धमकाया होगा लेकिन उम्मीद है वे भी आगे आएंगी और उनके खिलाफ और घिनौने सच दुनिया के सामने होंगे। मैं ये इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मुझे बेहतर ढंग से पता है कि अकबर जैसे शक्तिशाली लोग कैसे किसी का शोषण करते हैं। मैं ये लेख उन महिलाओं के आरोपों को सही साबित करने के लिए लिख रही हूं जो मेरी जैसी ही पीड़ा से गुजरी हैं। मैं अपनी बेटी और बेटे के लिए लिख रही हूं ताकि वे सिख सकें कि अगर उन्हें कोई परेशान करें तो अपना बचाव कैसे करना है। 23 साल पहले हुई घटना के काले सच से मैं बाहर निकल चुकी हैं और अब निरंतर आगे बढऩा चाहती हूं।

लेख पर अकबर की ओर से सफाई

वाशिंगटन पोस्ट ने जब इस खबर पर एमजे. अकबर से सफाई मांगी तो उनके वकील संदीप कपूर ने लिखित में कहा कि मेरे मुवक्किल ने इन आरोपों को गलत बताया है और सिरे से खारिज किया है।

पल्लवी गोगोई की आपबीती उन्हीं की जुबानी (वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत)



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