जनहित में दिए फैसलों के कारण इनकी बेंच को लोग ‘सोशल जस्टिस बेंच’ कहते थे

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लाइफस्टाइल डेस्क. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर को जानने वाले लोगों के मुताबिक वह हमेशा शांत रहने वाले और जूनियर वकीलों से सम्मान के साथ पेश आने वाले जजेस में से एक रहे हैं। हमेशा सामाजिक मुद्दों पर प्राथमिकता से सुनवाई और लोगों के हित में फैसला देने के कारण जस्टिस मदन जिस भी बेंच यानी न्यायपीठ में रहे, लोग उस न्यायपीठ को उनके नाम से बुलाने के बजाय सामाजिक न्यायपीठ (सोशल जस्टिस बेंच) कहने लगे थे।

जस्टिस लोकुर साथी वकीलों से बेहद शालीनता से पेश आते हैं, लेकिन वक्त आने पर वह सीनियर एडवोकेट्स से भी भिड़ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में वकील गोपाल शंकरनारायण की एक स्टोरी के मुताबिक आमतौर पर जजेस बड़े और सीनियर एडवोकेट्स से सीधा पंगा लेने में हिचकिचाते हैं, यह आग में हाथ डालने जैसा है। लेकिन जस्टिस लोकुर आम लोगों से जुड़े हुए मामलों में किसी से भी भिड़ जाते थे। इसका उदाहरण है 2007 में बीएमडब्ल्यू से तीन पुलिसकर्मियों समेत छह व्यक्तियों की कुचलकर जान लेने वाला मामला।

इसमें आरोपी की तरफ से पैरवी कर रहे दो सीनियर एडवोकेट आर के आनंद और आई यू खान को गलत तरीके आजमाने के कारण जस्टिस लोकुर ने चार महीने तक किसी भी अदालत में पैरवी करने पर रोक लगा दी थी। उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की पद्दवी से वंचित करने की सिफारिश भी की थी। इसी तरह 2012 में आंधप्रदेश के चीफ जस्टिस रहते हुए सीबीआई जज पी रामा राव को रिश्वत के एक मामले में तुरत-फुरत सस्पेंड कर दिया था।

मदन बी लोकुर की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हुई। बाद में बोर्ड परीक्षा इलाहाबाद के सेंट जोसेफ्स कॉलेज में पूरी हुई। मदन बी लोकुर के पिता जस्टिस भीमजी एन. लोकुर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहने के साथ पूर्व युनियन लॉ सेक्रेटरी भी रह चुके हैं। मदन बी लोकुर ने 1977 में वकील के तौर पर बार एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन करवाया और दिल्ली हाई कोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। मदन बी लोकुर 1997 में सीनियर एडवोकेट बने।

साल 1998 में वह भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया चुने गए। 1999 में दिल्ली हाई कोर्ट के एडिशनल जज बने। 2010 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर पदोन्नत किया गया। उसके बाद आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और फिर 4 जून 2012 में सुप्रीम कोर्ट में जज बने। 31 दिसंबर 2018 तक वह सुप्रीम कोर्ट में रहे। ऑल इंडिया केस मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से केस का रिकॉर्ड रखने के लिए जस्टिस लोकुर ने नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (एनजेडीजे) शुरू करवाया।

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decisions made in public interest their bench was called social justice bench



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