गुलजार बोले- शब्दों के मेरे गोदाम में बहुत कुछ है; जैसी व्यक्ति की संवेदनशीलता, वैसे उसके शब्द

0
151





अहमदाबाद.मशहूर शायर, फिल्म लेखक गुलजार शुक्रवार को स्वरोत्सव कार्यक्रम में भाग लेने यहांआए थे। इस दौरान उन्होंने दिव्य भास्कर के देवेंद्र भटनागर से बातचीत की शब्दों के चयन पर, शायरी में छिपे दर्द और मोहब्बत पर, खोते जा रहे बचपन पर और जिंदगी के फलसफे पर भी। दरअसल, गुलजार के बात करने का अंदाज निराला होता है। इसलिए इस बातचीत को भी हम उन्हीं के अंदाज में ही प्रस्तुत कर रहे हैं….

सवाल:शब्दों के शिल्पकार गुलजार। आप मन को ठंडक पहुंचाने वाले ये शब्द किस सुराही से चुनते हैं?
जवाब:मेरे पास सुराही तो नहीं है, हां, एक मटकी है वो भी मिट्टी की। वो अपने आप ही भरती रहती है, रिसती रहती है…। ये मटकी मेरे सिर पर हमेशा रखी रहती है। मैं तो इसे गोदाम भी कह देता हूं। मेरे इस गोदाम में बहुत कुछ है। वैसे, शब्दों का चयन दरअसल संवेदनशीलताएं हैं। हर शख्स के पास जैसी संवेदनशीलताएं होंगी, शब्द भी वैसे ही होंगे।

सवाल:आपकी शायरी में मुकम्मिल न हुए प्रेम की कसक क्यों है?
जवाब:आप मुकम्मिल होना पता नहीं किसे समझते हैं, मैं तो हर पल को मुकम्मिल समझता हूं। जिसे मैं कमी कहता हूं वो भी मेरे लिए मुकम्मिल है। जब किसी का एहसास है, और वो नहीं है तो अपने आप में वो लम्हा मुकम्मिल है। जिंदगी तो उन लम्हों में ही मिलती है, जो वहां होती है, सदियों में थोड़े ही जमा होती है। अब अगर मैं बार-बार जिक्र करता हूं तो इसका मतलब ये है कि मेरे अंदर बहुत कुछ है। बहुत मिलन बाकी है। ये कमी थोड़े ही है!

सवाल: जिंदगी क्या है? पहेली या बलखाती सड़क?
जवाब:मैं तब लिखता हूं जब मेरे अंदर कुछ उबलता है। मैं क्या लिखता हूं और मेरे लिखने से फर्क क्या पड़ता है, यह मैं कई बार सोचता हूं, लेकिन जैसे एक चूल्हे पर रखी हांडी में कुछ उबलता है और उसकी भाप से उस पर रखा बर्तन खड़खड़ाता है। यह भाप ही मेरे लिखने का कारण बनती है। बहुत सी हांडियां हैं। सभी ने जिंदगी चूल्हे पर रखी है। उस हांडी में जिंदगी पकाने के लिए रखी है। हर लेखक, हर शायर, जितने भी लोग हैं, हर आदमी जिंदगी को हांडी पर रखकर पकाता है। लेकिन ये जिंदगी न गलती है, न पकती है। बस, उबलती रहती है-उबलती रहती है। ये चूल्हा जला रहेगा और आप जिंदगी उबालते रहेंगे। जिंदगी यूं ही चलती है। जिंदगी की खूबसूरती ही यही है कि वो अनप्रीडिक्टीबल रहे। प्रीडिक्टीबल होती तो जिंदगी का पता ही नहीं चलता।

सवाल:80 की उम्र में आपको एक बच्चे को अपने अंदर जिंदा रखना क्यों जरूरी लगता है?
जवाब:हर वक्त एक बच्चे को अपने अंदर जिंदा रखिए। उसे कभी निगलेक्ट मत करिए। वर्ना आप अपने आपसे बोर हो जाओगे। मन के अंदर के इस बच्चे को जिंदा रखिए, वो पलता रहेगा, बढ़ा होता रहेगा। मासूम है वो। सवाल पूछता रहेगा…और प्रश्न होगा तो प्रगति होगी। वर्ना जिंदगी में ठहराव आ जाएगा। जो आपके अंदर की मासूमियत है वही बचपन है। मन के अंदर बचपन वो हो, जो बालिग होना चाहता है। जो जानना चाहता है। जो सीखना चाहता है। जो आपसे प्रश्न पूछना चाहता है। मेरे अंदर का बच्चा भी ऐसा ही है। इसीलिए मैं आज के दौर में आज के सवाल पूछता हूं।

सवाल:बच्चों का बचपन अब कहीं खो सा गया है। किसने छीन लिया उनका बचपन?
जवाब:हमने ही छीना है उनका बचपन। उनके हाथों में टीवी-मोबाइल थमाया किसने? हमने। इसलिए हमें ही इसका रास्ता ढूंढ़ना होगा। हम ही कहते हैं-मैं जरा काम कर लूं, तब तक तुम टीवी देख लो। लो, मैं चैनल लगा देता हूं। परेशान मत करो, लो मोबाइल और गेम खेलो। हमने ही तो छीना है उनका बचपन। बच्चों का कोई कसूर नहीं है। बच्चे के ऊपर मत डालिए कुछ। वो कुसूर अपने आप में पहचानिए कि ये कर कौन रहा है। ये मैं कर रहा हूं। बच्चों को जिम्मेदार बताना दरअसल अपने गुनाह छिपाने की हमारी एक कोशिश रहती है।

दिन कैसे शुरू करुं, काश कोई पासवर्ड हो?
जवाब:‘एक दफ्तरी शहर में बैठे हुए आदमी ऐसे कहता है ना कि यार दिन कैसे शुरू करुं? काश कोई पासवर्ड हो। अब वो दौर भी नहीं है कि आपने एक किताब में कोई फूल दबाकर रख दिया। ये दौर शर्मिला नहीं है। ये दिल की बात को डाउनलोड कर लेने वाला दौर है। कुल मिलाकर आपके अहसास वो होने चाहिए, जो इस दौर से मिले हुए हों।’

आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें


bhaskar interview with Poet and writer Gulzar



Source link

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here