गहने बेचकर 25 हजार में शुरू की थी फिल्म इंडस्ट्री, अब स्टार नाम भी नहीं लेते

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मनीषा भल्ला | मुंबई .बात 2014 की है। उस दिन मैं और मेरी पत्नी शशि कपूर के बंगले पहुंचे थे। शशि कपूर को दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड मिला था, हम उन्हें बधाई देने गए थे। लेकिन गेट पर ही शशि कपूर के बेटे करन कपूर ने रोक लिया। परिचय देने के बावजूद मिलने नहीं दिया। 25 हजार रुपए में पत्नी के गहने बेचकर देश को बॉलीवुड इंडस्ट्री देने वाले दादा साहब फाल्के के नाती चंद्रशेखर यह बात बतातेे हुए रो देते हैं। बताते हैं कि दादा साहेब की वजह से बॉलीवुड एक इंडस्ट्री के रूप में आज हमारे सामने है। 17 हजार करोड़ रुपए का यह उद्योग करीब 5 लाख लोगों को सीधे रोजगार देता है। लेकिन यह इंडस्ट्री दादा साहेब को भुला चुकी है। फिल्म इंडस्ट्री दादा साहब के लिए भारत रत्न की मांग करे या उन्हें सिनेमा का पितामह बोलना बंद करे।

चंद्रशेखर कहते हैं कि 1969 से भारत सरकार दादा साहब के नाम पर अवाॅर्ड दे रही है, लेकिन 30 अप्रैल को उनके जन्मदिन और 16 फरवरी को पुण्यतिथि पर कोई भी कलाकार उनके बारे में एक शब्द नहीं बोलता। बहुत गरीबी में दादा साहेब फाल्के की मौत हुई थी। तब भी मुट्ठीभर लोग उनके जनाजे में शामिल हुए थे। गौरतलब है कि दादा साहब का जन्म 30 अप्रैल 1870 को हुआ था।

फाल्के साहब के सिनेमा के जुनून ने उनसे उनका घर-बार सब छुड़वा दिया था। अब फिल्म इंडस्ट्री की जिम्मेदारी है कि वे दादा साहेब के लिए भारत रत्न की मांग करे। चंद्रशेखर बताते हैं कि दादा साहेब और लोकमान्य तिलक बहुत अच्छे मित्र थे। दादा साहेब की फिल्में नहीं चलने से वो भारी कर्ज में डूब गए थे। कर्जदार हर रोज घर पहुंच जाते थे। नाना ने लोकमान्य तिलक से यह नहीं कहा कि कर्ज नहीं चुकाया तो वे डूब जाएंगे। दादा साहेब को अपने डूबने की चिंता भी नहीं थी। उन्हें चिंता थी कि कर्ज न चुकाने पर सिनेमा डूब जाएगा। तब तिलक ने जनता से अपील की कि वे फाल्के की मदद करें। उसके बाद जनता और कई रियासतों ने आर्थिक मदद कर सिनेमा को बचाया। सिनेमा को आर्थिक संकट से निकालने के लिए फाल्के साहेब ने कई काम किए। जादू का खेल दिखाया। साबुन बनाकर बेचा। वह इन कामों से घर चलाते। फाल्के की ज़िंदगी में टर्निंग पॉइंट तब आया जब 1917 में उनकी लंकादहन फिल्म ब्लॉक बस्टर साबित हुई।

1912 में दादा साहेब ने फाल्के फिल्म कंपनी बनाई थी। 1913 में दादा साहब ने पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई थी। चंद्रशेखर बताते हैं कि मेरे नाना की इस फिल्म के लिए नानी सरस्वती बाई ने अपने गहने 25 हजार रुपए में बेच दिए थे। उसके बाद कुछ कारोबारियों के साथ मिलकर हिंदोस्तान फिल्म कंपनी खोली। कारोबारियों से परेशान होकर 1922-23 में वे सिनेमा से संन्यास लेकर बनारस चले गए। वहां से वापस मुंबई आ गए। फिर अपनी ही बनाई हिंदोस्तान फिल्म कंपनी में सैलरी पर नौकरी करने लगे। साल दर साल उनका वेतन बढ़ने की जगह घटता गया।

आखिर में इस्तीफा दे दिया। फिर दादा साहेब फाल्के ने फिल्म निर्माण के लिए सरकार को लाइसेंस के लिए पत्र लिखा, लेकिन सरकार ने लाइसेंस नहीं दिया। इसी साल वो बीमार पड़ गए। 1944 में नासिक में उनके घर पर उनकी मौत हो गई। उसके बाद परिवार की आर्थिक हालत और खराब हो गई। सिनेमा को स्थापित करने के लिए कर्ज लिए पैसों को चुकाने के लिए नानी ने कैमरों को बेच दिया। उनमें से बचे कुछ पैसों से ही घर चलाने लगीं।

चंद्र शेखर बाताते हैं कि दादा साहेब की दूसरी पत्नी सरस्वती बाई देश की पहली महिला फिल्ममेकर थीं। वे उम्र में दादा साहेब से 20 साल छोटी थी। रोज अकेले क्रू के 70-80 लोगों के लिए खाना बनातीं, लंदन से आई 200 फुट फिल्म रील की पंचिंग करतीं, फिल्म डेवलप भी करती थीं। 30 अप्रैल 1870 को जन्मे दादा साहेब के नाती चंद्रशेखर मुंबई के माहिम इलाके मेंे एक कमरे के घर में रहते हैं। 62 साल के चंद्रशेखर एक निजी कंपनी से अकाउंटेंट पद से रिटायर हैं। उनकी पत्नी को मिलने वाली 30 हजार रुपए पेंशन से घर चलता है। इसी में से कुछ पैसा बचाकर दादा साहेब के कामों के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम भी करते हैं। चंद्रशेखर की पीड़ा यह है कि अमिताभ बच्चन हो या तीनों खान बंधू कोई बड़ा कलाकार दादा साहेब के नाम को जिंदा रखने के लिए कुछ नहीं कर रहा है।

इतने सालों में बड़े स्टार्स की ज़ुबान से कभी दादा साहेब फाल्के या उनकी पत्नी का नाम तक नहीं सुना है। अब फाल्के साहेब की तीसरी पीढ़ी में से कोई भी सिनेमा से नहीं जुड़ा है। मेरी मां मालती फाल्के जब जिंदा थीं तो एक कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन उनकी बगल की सीट पर बैठे थे। उन्होंने मां से परिवार की खैरियत पूछी। उसके अलावा 2015 में दादा साहेब फिल्म फाउंडेशन अवॉर्ड कार्यक्रम में जब आयोजनकर्ता ने शाहरुख खान से मिलवाया तो शाहरुख ने अदब से दोनों हाथ जोड़कर झुककर इज्ज़त अफज़ाई की। एक बार सलमान ने स्टेज पर बुलाकर इज्ज़त दी।

करीब 100 साल के सिनेमा के इतिहास में केवल सुनील दत्त ने ही दादा साहेब फाल्के या उनके परिवार की मदद की है। मेरे नाना के सात बेटे और दो बेटियां थीं। एक बेटी मालती यानी मेरी मां थीं। उन्हें कैंसर था। जब मेरी मां की कैंसर की बीमारी और गरीबी के बारे में मुंबई के एक अखबार में छपा, तब उस वक्त सांसद रहे सुनील दत्त ने पढ़ा। फिर ढूंढते हुए मेरी मां के घर पहुंचे। सरकार से मदद दिलवाई।

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Selling jewellery started in 25 thousand film industry



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