कैसा है कनेक्टेड MRI मशीनों का आइडिया

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गैजेट डेस्क. सोशल मीडिया पर जिन बहुत से विचारों की खिल्ली उड़ाई जाती है, उनमें से एक में मेरी दिलचस्पी है और वह है- देश की तमाम एमआरआई मशीनों को कनेक्ट करने का सुझाव। कई लोग देशभर या दुनियाभर की एमआरआई मशीनों को कनेक्ट करने के विचार को हास्यास्पद मान सकते हैं, लेकिन यह वैसा नहीं है। बल्कि यह नए दौर की तकनीकी हकीकत है। आज नहीं तो कल हम इसे अपने आसपास घटित होते हुए देखेंगे।

सवाल उठता है कि आखिर एमआरआई मशीनों को कनेक्ट करने की जरूरत क्यों है? आज तकनीकी दुनिया का फोकस जिन चीजों पर है, उनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कनेक्टेड डिवाइसेज़, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा एनालिटिक्स खास तौर पर काबिलेजिक्र है। हम अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों और पहलुओं से डेटा इकट्ठा कर रहे हैं, भले ही वह हमारी जानकारी में हो या न हो। इस डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है और उसकी मदद से क्रांतिकारी तकनीकें सामने आ रही हैं। चिकित्सा का क्षेत्र भी इनसे अछूता नहीं है। वहां भी तमाम तरह से मरीजों, बीमारियों, लक्षणों, व्यवहारों, प्रभावों, बैकग्राउंड, इलाज, साइड इफेक्ट्स, डायग्नोसिस आदि की सूचनाएं इकट्ठी की जा रही हैं।

विदेशों की बात छोड़िए। अपने हिंदुस्तान के ही कुछ उदाहरण देखिए। तमिलनाडु में पूरी तरह से कनेक्टेड टेलीरेडियोलॉजी प्रणाली पर काम चल रहा है, जिसके तहत 58 सीटी स्कैन और 18 एमआरआई मशीनों को आपस में जोड़ा जा रहा है। ये सभी सरकारी अस्पतालों की मशीनें हैं। इनसे इकट्ठा होने वाला डेटा एक केंद्रीय सर्वर में लोड किया जाएगा और बाद में इंसानियत के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए उसका विश्लेषण करके इस्तेमाल किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के दस और हरियाणा के 20 अस्पतालों में भी इसी तरह की नेटवर्किंग की जा चुकी है। केरल में भी ऐसी परियोजना जारी है। भारत में चलने वाले कोलंबिया एशिया समूह के 14 अस्पतालों में भी ऐसा किया जा चुका है।

चिकित्सा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीकों के प्रभाव से क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं। आज ऐसे थ्री-डी प्रिंटर मौजूद हैं जो कृत्रिम अंग तैयार कर सकते हैं। क्या आपने एआई पर आधारित प्रीडिक्टिव एनालिसिस के बारे में सुना है जो इस बात की भविष्यवाणी कर देता है कि कितने साल बाद अमुक शख्स को दिल का दौरा पड़ने या फिर मोतियाबिंद का शिकार होने की आशंका है? यह सब विभिन्न मशीनों, मरीजों, अस्पतालों, चिकित्सा प्रक्रियाओं, जीवनशैली, बीमारियों के इतिहास आदि के डेटा का विश्लेषण करके ही संभव हो पा रहा है। इस प्रक्रिया में एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी मशीनों की भी भूमिका हो सकती है।

दुनिया भर में एमआरआई क्लाउड या कनेक्टेड एमआरआई जैसे कॉन्सेप्ट्स चर्चा में हैं। अमेरिका की ओपन एक्सेस सीरीज ऑफ़ इमेजिंग स्टडीज (ओएसिस) ऐसी ही एक परियोजना है जो न्यूरोइमेजिंग डेटा इकट्ठा करती है। कोई संस्थान चाहे तो इस डेटा का इस्तेमाल अपने शोध और विकास के लिए कर सकता है।

अगर कोई अस्पताल अपने डेटा को क्लाउड पर सहेजता है तो वह अपने यहां के तमाम उपकरणों से एकत्र होने वाले डेटा का विश्लेषण करने की स्थिति में आ जाता है। ये उपकरण अनगिनत प्रकार के लोगों को स्कैन करते हैं और उनका डेटा तैयार करते हैं। अगर इस डेटा का विश्लेषण किया जाए और एआई का प्रयोग किया जाए तो उपकरणों द्वारा दिए जाने वाले नतीजे बेहतर हो सकेंगे। उनके निष्कर्ष सिर्फ उस एक व्यक्ति के शारीरिक लक्षणों के विश्लेषण तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उसकी तुलना दूसरे हजारों लोगों के साथ पहले किए गए परीक्षणों से करके ज्यादा सटीक परिणाम दे सकेंगे। अब यह तो सिर्फ एक अस्पताल या अस्पताल समूह की बात हुई। इसी अनुभव को आप एक से अधिक अस्पताल समूहों तक ले जा सकते हैं, पूरे शहर तक विस्तार दे सकते हैं या फिर पूरे राज्य या देश तक भी। कल्पना कीजिए कि अगर दुनिया भर का ऐसा डेटा तैयार हो जाए तो वह डायग्नोसिस की प्रक्रिया को कितना अधिक सटीक बना देगा?

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tech & science talk on Connected MRI or cloud MRI concept by tech expert balendu sharma dadhich



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